विभिन्न ग्रन्थों में वर्णित प्राणायाम के स्वरूप एवं प्रभाव पर विमर्श
Bagish Ojha Research Scholar, Dept. Vaidic Darshan SVDV Banaras Hindu University, Varanasi, Uttar Pradesh, India Email: Acharyavageeshji@gmail.com Abstract: प्राणायाम भारतीय योगपरम्परा की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण साधना है, जिसे प्राण-शक्ति के नियमन एवं संवर्धन का माध्यम माना गया है। प्रस्तुत शोधपत्र में वेद, उपनिषद्, योगदर्शन, हठयोगप्रदीपिका, मनुस्मृति, आयुर्वेदिक ग्रन्थों तथा महाकाव्यों में वर्णित प्राणायाम के स्वरूप, तात्त्विक आधार एवं उसके बहुआयामी प्रभावों का समालोचनात्मक अध्ययन किया गया है। ग्रन्थों के आधार पर यह स्पष्ट किया गया है कि प्राण केवल श्वसन-क्रिया तक सीमित न होकर समस्त शारीरिक, मानसिक एवं चेतनात्मक क्रियाओं का मूल तत्त्व है। अध्ययन में यह प्रतिपादित किया गया है कि प्राणायाम के नियमित अभ्यास से श्वास-प्रश्वास की गति नियंत्रित होकर चित्त की चंचलता का क्षय होता है, जिससे धारणा, ध्यान एवं समाधि की योगिक अवस्थाओं की प्राप्ति सहज हो जाती है। शास्त्रों में प्राणायाम को पाप-नाशक, इन्द्रिय-निग्रहक, चित्त-शोधक एवं दीर्घायु प्रदान करने वाला श्रेष्ठ तप कहा गया है। आयुर्वेदिक दृष्टि से प्राणवायु को जीवन, बल एवं आयु का आधार मानते हुए उसे समस्त शारीरिक तंत्रों का प्रेरक स्वीकार किया गया है। निष्कर्षतः यह शोध–पत्र प्रतिपादित करता है कि प्राणायाम शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन तथा आध्यात्मिक उन्नति का समन्वित साधन है, जो आधुनिक जीवन की तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी मानव को स्वस्थ, दीर्घायु एवं संतुलित जीवन की दिशा प्रदान करता है।
Keywords: प्राणायाम, श्वास–प्रश्वास, योगदर्शन, हठयोग, चित्तशुद्धि, मन–प्राण सम्बन्ध, स्वास्थ्य एवं आरोग्य, आध्यात्मिक साधना।