पुराणों में नारी की भूमिका और आदर्श रूप का प्रतिपादन
Venkatesh Mishra
Research Scholar, Dept. of Vaidic Darshan, SVDV
Banaras Hindu University, Varanasi, Uttar Pradesh, India
Email: vbmb1995@gmail.com
Abstract: भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में पुराण साहित्य एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, जो न केवल धार्मिक मान्यताओं और कृत्यों का आधार प्रस्तुत करता है, बल्कि समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक ढांचे को भी गहराई से प्रभावित करता है। ‘पुराण’ शब्द “पुरा अपि नवं भवति इति पुराणम्” इस व्युत्पत्ति-सूत्र से माना जाता है। अर्थात्— जो प्राचीन होकर भी नित नूतन अर्थ देने वाला हो, उसे पुराण कहते हैं। इस प्रकार ‘पुराण’ का शाब्दिक अर्थ होता है – “प्राचीन ग्रंथ” या “पुरातन ज्ञान”।
पुराणों में वर्णित कथाओं, उपदेशों और चरित्रों के माध्यम से भारतीय जीवन-मूल्यों का समग्र चित्रण मिलता है। इसी संदर्भ में नारी की भूमिका और उसके आदर्श रूप का प्रतिपादन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पुराणों में नारी को केवल एक सामाजिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि सृजन, संरक्षण और सांस्कृतिक निरंतरता की आधारशिला के रूप में चित्रित किया गया है। देवी स्वरूपों के माध्यम से नारी को शक्ति, करुणा, ज्ञान और समर्पण जैसी विविध गुणों का प्रतीक माना गया है। दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी आदि देवियों के रूप में नारी का आदर्श रूप सम्पूर्ण समाज के लिए प्रेरणादायक है, जो यह दर्शाता है कि नारी शक्ति और संवेदना दोनों का समुच्चय है।
इसके अतिरिक्त पुराणों में पार्वती, सीता, गार्गी, अनुसूया, दमयंती जैसी पात्राएँ नारी के विविध रूपों और भूमिकाओं को प्रतिष्ठित करती हैं—कहीं वह आदर्श पत्नी के रूप में, कहीं तपस्विनी के रूप में, तो कहीं ज्ञान और धर्म के संरक्षण की प्रवर्तक के रूप में दिखाई देती है। ये पात्र न केवल नारी के आदर्श रूप को रेखांकित करती हैं, बल्कि समाज में उसके कर्तव्यों, अधिकारों और गरिमा को भी स्थापित करती हैं। इस प्रकार पुराण साहित्य नारी को उच्च स्थान प्रदान करते हुए उसके योगदान, त्याग, शक्ति और आदर्शों का व्यापक चित्र प्रस्तुत करता है। पुराणों में वर्णित नारी के ये विविध आयाम आज भी सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होते हैं।
Keywords: पुराणों में नारी-प्रतिष्ठा, शीलवती पुत्री की महत्ता, कन्या-प्राप्ति अनुष्ठान, वैदिक-पुराणिक नारी-दृष्टि, विवाह-परंपरा एवं सामाजिक मान्यताएँ, स्त्री की धार्मिक सहभागिता, नारी शक्ति एवं धर्मभूमिका