वेदसम्मत देवतास्वरूप का पर्यालोचन
Dr. Shreenarayana Pathak
Assistant Professor
Shahid Hira Singh Government Post Graduate College
Dhanapur, Chandauli, UP, India
Email: shreenarayanpathak790@gmail.com
Abstract: इस संसार में स्वाभिलषित मनोरथ और पुरुषार्थ को प्राप्त करने की वाञ्छा रखने वाले मानव का दैव और पुरुषकार (कर्म) ये दो परम साधन माने गये हैं। दण्डचक्रचीवरन्याय से दैव और पुरुषकार इन दोनों को परस्पर संमिलित साधन माना जाये अथवा तृणारणिमणिन्याय से पृथक् साधन माना जाये? इसके अतिरिक्त देवता का प्राबल्य है या पुरुषकार का, यह विचार चिरन्तनकाल से संशय का केन्द्रबिन्दु रहा है? याग, दान, होम पूजादि वेदविहित कर्मों से आराधित इन्द्रादिदेवता प्रसन्नचित्त होकर तत्तद् कर्म करने वाले को योग्यतानुसार फल देते हैं? अथवा देवता से निरपेक्ष तत्तद् कर्म ही स्वजन्य अपूर्वद्वारा कर्ता को फलोपयोग्य बनाते है? इन दोनों पक्षों में क्या विशेष है? वैदिकयाग के दो विशेषपदार्थ बतलाये गये हैं— “यागस्य द्वे रूपे द्रव्यं देवता च।” इन दोनों पदार्थों के मध्य देवता का वैदिक यथार्थस्वरूप क्या है? श्रीशबरस्वामी ने देवता स्वरूप के विमर्शावसर पर कहा है कि ‘का पुनरियं देवतानाम’ यहाँ से आरम्भ करके ‘एकं तावन्मतम्’ ‘अपरं मतम्’ इत्यादि वाक्यों द्वारा मतद्वय को पूर्वपक्षरूप से रखकर पुनः उसमें अपनी अरुचि देते हुये अनेक पक्ष-पक्षान्तरों का अवतरण किया है। प्रस्तुत शोध-पत्र में शोधार्थी द्वारा इन सभी प्रश्नों का यथासम्भव समाधान करते हुये वैदिक देवताविषयस्वरूप का विहङ्गमदृष्टि से पर्यालोचन किया जायेगा।
Keywords: देवता, विग्रह, कर्म, पुरुषकार, दैव, श्रुति, प्रमाण, ऐहिक, आमुष्मिक, उपसर्जन।