आधुनिक समाज में श्रीमद्भागवत की उपयोगिता
Ghanshyam Das
Research Scholar, Dept. Vaidic Darshan, SVDV
Banaras Hindu University, Varanasi, Uttar Pradesh, India
Email: gdasbhu@gmail.com
Abstract: सृष्टि के आरम्भ से लेकर आज तक मानव जीवन के इतिहास में हमारे आध्यात्मिक ग्रन्थो ने मनुष्य के जीवन दर्शन, व्यवहार, विचार, संस्कृति को सदैव प्रभावित किया है। हमारी भारतीय ज्ञान परम्परा में वेद, पुराण, साहित्य आदि का अमूल्य योगदान रहा है, क्योंकि यह सब धार्मिक ग्रन्थ धर्म के अतिरिक्त सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक शिक्षाओं का मुख्य स्रोत हैं। इन ग्रन्थो में श्रीमद्भागवत महापुराण धार्मिक और व्यावहारिक शिक्षा के लिए सर्वोच्च धार्मिक ग्रन्थ है। यह केवल धर्म ग्रन्थ ही नहीं बल्कि जीवन व्यवहार, नैतिक मूल्य, मानसिक स्वास्थ्य, नेतृत्व, सम्बम्ध, समाज और अंतिम सत्य को बताने वाला अद्भुत एवं अद्वितीय ग्रन्थ है। मानव जीवन में विकास के साथ-साथ जीवन की गति भी तीव्र हो गई है, आधुनिक तकनीक, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, भौतिक सुख की इच्छाओं ने मानव जीवन के अन्दर अत्यधिक तनाव, असुरक्षा, एकाकीपन और अनेकानेक मानसिक द्वन्दों को भर दिया है जिसमें तनाव, अवसाद, सम्बम्धों में दूरी, आत्महीनता, नैतिक एवं चारित्रिक पतन, जीवन में बढ़ती आवश्यकताओं एवं मानसिक असंतुष्टि आधुनिक समाज की सबसे जटिल एवं अन्तहीन समस्याओं के रूप में दिखाई देती है आज के समय में जब प्रत्येक मनुष्य के जीवन का प्रत्येक क्षण लगभग असन्तुलित होता हुआ दिखाई देता है तब जीवन के इस अन्धेरे में श्रीमद्भागवत महापुराण में भक्तों की प्रेरणास्पद कथाएं भागवत का उपदेश एक पूर्ण प्रकाशित सूर्य के समान दिखाई देता है आधुनिकता से ओतप्रोत मानव जीवन चाहे जितना भी परिवर्तित हो जाए किन्तु मानव के अन्तर्मन में आत्मिक शान्ति और सत्य की खोज आज भी उतनी ही जारी है इस स्थिति में श्रीमद्भागवत महापुराण मनुष्य जीवन के अनेक दोषों के निवारणार्थ एक दिव्यौषधि के समान है यह दिव्यौषधि जो भौतिक और मानसिक सभी प्रकार से इस जीवन को सन्तुलित करती है। यह ग्रन्थ केवल धार्मिक ग्रन्थ ही नहीं बल्कि जीवन दर्शन और जीवन जीने की कला को मनुष्य के अन्दर प्रकाशित करता रहा है।
Keywords: श्रीमद्भागवत महापुराण, आधुनिक समाज, मानसिक स्वास्थ्य एवं शान्ति, नैतिक मूल्य, जीवन दर्शन एवं कर्मयोग।