भारतीय ज्ञान परम्परा में यम-साधना की प्रासङ्गिकता: पतञ्जलि योगसूत्र के परिप्रेक्ष्य में

Author(s): Dr. Parimal Mandal
Assistant Professor, Dept. of Sanskrit
Swarnamoyee Jogendranath Mahavidyalaya
Amdabad, Nandigram, Purba Medinipur, West Bengal, India
E-mail: parimalbhu@gmail.com
Page no: 166-174

Abstract: भारतीय ज्ञान परम्परा में योग एक समग्र जीवन-पद्धति के रूप में विकसित हुआ है, जिसका उद्देश्य केवल शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक उन्नति है। पतञ्जलि योगसूत्र में प्रतिपादित अष्टाङ्ग योग का प्रथम चरण ‘यम’ साधक के जीवन के लिए नैतिक अनुशासन की आधारशिला है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे यम-प्रविधान साधना-पथ के लिए अनिवार्य हैं। 21वीं सदी की भौतिकवादी प्रवृत्तियों, नैतिक संकटों, सामाजिक अशान्ति और मानसिक तनाव की स्थितियों में यम-साधना की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। यह शोध पत्र पतञ्जलि योगसूत्र के आलोक में यम-साधना के सिद्धान्तों का विश्लेषण करते हुए यह प्रतिपादित करता है कि भारतीय ज्ञान परम्परा की यह प्राचीन शिक्षापद्धति आधुनिक जीवन में नैतिक संवेदनशीलता, मानसिक शान्ति और सामाजिक सामञ्जस्य की स्थापना हेतु एक सशक्त माध्यम है।

Keywords: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, अष्टाङ्गयोग, आधुनिक जीवनशैली, यम, राजमार्तण्ड, मणिप्रभा, योगसिद्धान्तचन्द्रिका।
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